आगरा उत्तर प्रदेश धर्म

रक्षाबंधन पर छाएंगी गाय के गोबर से बनी तुलसी वाली राखियां

  • आगरा नगर निगम ने तैयार की खास ‘सीड राखी’
  • राखी फेंकने के बजाय गमले में उगाएं तुलसी का पौधा
  • ₹15- 20 की कीमत पर नगर निगम परिसर में मिल रही राखियां
  • गौशालाओं में गोबर बन रहे कई प्रकार के ईको- फ्रेंडली उत्पाद
  • योगी सरकार में उत्तर प्रदेश की गौशालाएं बन रहीं आत्मनिर्भर

आगरा (रोमा)। भाई- बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन पर्व नजदीक आते ही बाजारों में राखियों की रौनक दिखने लगी है। इस बार आगरा में एक खास तरह की राखी चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसे नगर निगम की गौशाला में गाय के गोबर से तैयार किया गया है। इन राखियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें तुलसी का बीज रखा गया है, जिससे त्योहार के बाद उसे गमले में डालने पर तुलसी का पौधा उग आएगा।

गौशालाओं की आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम*
नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. अजय कुमार सिंह ने बताया कि नगर निगम अपनी गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पाद बना रहा है। दिवाली पर जहाँ गोमय गणेश- लक्ष्मी की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, वहीं होली पर गोकाष्ठ तैयार किया जाता है। अब रक्षाबंधन को लेकर भी गौशाला में आकर्षक राखियां बनाई जा रही हैं। गोबर से बनी इन

राखियों में तुलसी का बीज रखा जा रहा है, ताकि लोग इन्हें फेंकने के बजाय गमले में उगा सके और पर्यावरण में सकारात्मक योगदान दे सकें। उन्होंने बताया कि लोगों की पसंद को देखते हुए रंग- बिरंगी राखियां बनाई जा रही हैं, जिनकी कीमत भी बहुत अधिक नहीं रखी गई है। मात्र 15- 20 रुपये में ये राखियां नगर निगम परिसर में स्थित दुकान पर उपलब्ध होंगी।

*राखियों के साथ अन्य गोमय उत्पाद भी लोकप्रिय*
नगर निगम परिसर में स्थित दुकान के संचालक प्रांकुर जैन ने बताया कि गौशाला में केवल राखियां और प्रतिमाएं ही नहीं बनाई जा रही हैं, बल्कि कई अन्य उत्पाद भी तैयार हो रहे हैं, जिन्हें लोग खासा पसंद कर रहे हैं। इनमें पौधरोपण के लिए खास सीड बॉल भी शामिल हैं। गाय के गोबर से तीन तरह की सीड बॉल बनाए जा रहे हैं, जिनमें सहजन, जामुन और नीम के बीज डाले

गए हैं। लोग इन्हें उन जगहों पर रख और फैंक सकते हैं, जहाँ पानी का पर्याप्त इंतजाम है। जैसे मानसून के समय जमीन में नमी बनी रहती है, ऐसे में सड़क के किनारे, पार्क या अन्य नमी वाले स्थानों पर इन्हें फेंक दिया जाए, तो वहां कुछ दिनों बाद सीड बॉल में से पौधा निकल आएगा। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ- साथ गौशालाओं आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद कर रही है।

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